कौटिल्य के अनुसार एक राष्ट्र कैसा होना चाहिए | कौटिल्य का राष्ट्र सिद्धांत

Published by Dakshya on

हेलो दोस्तों आज हम यहां लेख में जानेंगे कौटिल्य के अनुसार एक राष्ट्र कैसा होना चाहिए (state of theory) , कौटिल्य के अनुसार एक राजा का कर्तव्य क्या होना चाहिए इसके बारे में पूरी तरह आलोचना करेंगे। तो चलिए ज्यादा देर ना करते हुए शुरू करते हैं यह लेख।

मनु और पारा शंकर के जैसे कौटिल्य भी स्वधर्म परंपरा को स्वीकार किए हैं. समाज में चार प्रकार की जाती रहके अपने धर्म के पालन करते हैं इसके अलावा वह राष्ट्र के ऊपर अपने कर्तव्य पालन करते हैं। एक राष्ट्र कैसा होना चाहिए राष्ट्रीय में क्या क्या होना चाहिए उसका उपादान क्या होना चाहिए इसके बारे में विशुद्ध रूप से कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखे हैं।

कौटिल्य के अनुसार एक राष्ट्र गठन में क्या-क्या उपादान होता है।

• कौटिल्य के अनुसार राज्य का मुख्य होता है एक राजा तथा स्वामी वह संप्रभुता क्या माता की अधिकारी होता है। राज्य का मुख्य एक तथा एकाधिक हो सकता है। कौटिल्य के थ्योरी में इसको संप्रभुता राजा (Sovereignty King) के नाम पर बताया गया है।

• अच्छे राज्य के लिए केवल एक अच्छे राजा होना ही उचित नहीं है इसके लिए एक सुसंगठित अमर्त्य संस्था होना आवश्यक है। अमर्त्य संस्था राज्य की शासन व्यवस्था में गुरुत्व पूर्ण स्थान अधिकार करते हैं। अमात्य का अर्थ होता है मंत्री अर्थात अमर्त्य संस्था का मतलब है मंत्री परिषद जिसका काम है राजा का सहयोग करना। राज्य में अच्छे से शासन चलाने के लिए एक मंत्री परिषद राजा को सहयोग करना आवश्यक है।

जनपद राज्य की तृतीय उपादान है। जनपद यह एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है जनसंख्या तथा आयतन को समझाता है। बिना जनसंख्या और भूखंड के बिना राज्य गठन असंभव है।

• राजीव की परवर्ती उपादान है दुर्ग। कौटिल्य इसको राज्य की एक मुख्य अंश के रूप में ग्रहण किए हैं। राज्य गठन में कौटिल्य राज्य की रक्षण तथा सुरक्षा को भी ध्यान में रखें वह इसके ऊपर काफी जोर किए हैं। वह अपने पुस्तक अर्थशास्त्र में बहुत सारे दुर्ग के बारे में वर्णन किए हैं उनमें से कुछ है- पर्वत दुर्ग, जलदुर्ग, मरु दुर्ग और जंगल दुर्ग देसी दुर्ग राष्ट्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभाती है।

• कोष – राजकोष तथा अर्थकोष राष्ट्रों की पंचम उपादान है। बिना पैसे बिना अर्थ के राज्य की उन्नति तथा सूसंगठन कष्ट साध्य इसलिए राष्ट्र की राहत कोष  मजबूत होना आवश्यक है। राज्य में अपार संपत्ति हो या ना हो लेकिन राज्यों की जरूरत पूर्ण संपत्ति आवश्यक है एक सुदृढ़ राष्ट्र बनने के लिए।

• सेना वाहिनी तथा बल राष्ट्र की छटा उपादान है। राज्य की देखरेख और स्थिति बनाए रखने के लिए सेना वाहिनी आवश्यक है। अच्छे सेना वाहिनी से एक दृढ़ राष्ट्रीय बनता है और राज्य शत्रु की परिहार से सुरक्षित रहता है। यह सभी को दृष्टि में रखकर कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में छह प्रकार सेना वाहिनी की आलोचना तथा वर्णन किए हैं। पारंपरिक बंसगत सेना, भाड़े की सेना, युद्ध खोर सेना, मित्रों लोगों की सेना, शत्रु  की सेना, …. , इस तरह के क्षेत्र कर सेना के बारे में वर्णन किए  हैं.


• मित्र- यह राज्य की परवर्ती उपादान है।


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