पुरी रथ यात्रा का महत्व | Rath Yatra

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विश्व देवता श्री जगरनाथ केबल ओड़ीसा लोगों के भगवान नहीं , समग्र विश्व हिंदू समाज के वह है  आराध्य देवता। उनके निवास स्थान है पवित्रा महोदधि तट प्रांतीय नीलाचल श्रीमंदिर मध्यस्थ रत्न सिंहासन। श्री जगन्नाथ अपने जस्ट भ्राता बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के साथ रहते हैं । उनके परम पवित्र निवास स्थान संघक्षेत्र तथा पुरुषोत्तम क्षेत्र नाम से परिचित है। भारत के चार धामों में से यह है कुछ अलग और श्रेष्ठ।

इस पुरुषोत्तम क्षेत्र पूरी नाम से प्रसिद्ध है। भगवान श्री जगन्नाथ को समर्पित पूरी में प्रतिवर्ष जो विश्व विख्यात उत्सव आयोजित किया जाता है वह रथयात्रा नाम से पूरे दुनिया में प्रसिद्ध है। यह हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण उत्सव है जहां भगवान श्री जगन्नाथ मंदिर से बाहर अपने भक्तों को मिलने आते हैं।

रथ यात्रा का उत्पत्ति और इतिहास :

रथ यात्रा की उत्पत्ति और इतिहास जिस तरह प्राचीन और उस तरह निसंदेह। विभिन्न संहिता, पुराण और धर्म शास्त्र प्रमाण देता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, नारद पुराण, नीलाद्री महोदय, बामदेव संहिता और सुता संहिता में श्री जगन्नाथ भगवान की रथ यात्रा विषय में वर्णन किया गया है। “श्रीमंदिरा समाचार” मैं रथ यात्रा की उत्पत्ति के संपर्क में बताई गई है।

जब  जगन्नाथ धर्म  प्रथम प्रवर्तक महाराज इन्द्रदुम्न श्री क्षेत्र को आए थे उस समय वहां भगवान को देख नहीं पाए थे। इससे वह निराश हो गए थे यह समय देवर्षि नारद उनके सपने में आए और उनको निर्देश दिए थे. निर्देश के अनुसार इन्द्रदुम्न पुरुषोत्तम क्षेत्र में एक यज्ञ आयोजित किए थे। यहां यज्ञ कर्म ही पुरुषोत्तम क्षेत्र के सर्वप्रथम आध्यात्मिक कर्म और जगन्नाथ के अनावरण कर्म को लेकर रथयात्रा बा घोष यात्रा कहा जाता है। रथ यात्रा का दूसरा नाम गुंदीचा यात्रा तथा श्रीगुंदीचा। पुराण में वर्णित मालव राजा इन्द्रदुम्न के रानी यह  यात्रा प्रचलन करने के हेतु उनके नाम के अनुसार इसको गुंदीचा यात्रा कहां जाता है।

चोल गंगा के रानी ” गंडी रोड़ी” के शुरू की गई यात्रा, समय के साथ सांप गुंदीचा नाम में प्रसिद्ध हुआ बोल कर कहा जाता है । अन्य लोगों की राय दें गुड्डीसा (लकड़ी) शब्द से निकला गुंदीचा शब्द।

रथ यात्रा की प्राचीनता के बारे में पुराण, इतिहास से पता चलता है कि भारत और भारत के बाहर भी रथ यात्रा का प्रचलन था। सूर्य देव आकाश मार्ग पर रथ से यात्रा करने की कथा पुराण में लिखी गई है। यदि की अतीत में  कोणार्क सूर्य मूर्ति को रथ में बिठाकर परिक्रमा किया जाता था।

दस अवतार मे से बुद्धा अवतार अलग है। लोग कहते हैं की बुध के दांत जगन्नाथ के अंदर अवस्थित है। चैत्र मोहिते मे  बौधिक लोगो के द्वारा आयोजित रथ यात्रा जगन्नाथ रथ यात्रा के साथ  काफी समानता दिखाई देता है । इसके अलावा नेपाल में वैशाख महीने में आयोजित “भैरव यात्रा” ही रथ यात्रा कारण “विमला भैरव यत्र जगरनाथस्तु भैरव: ” पुनश्च नेपाल में शिवलिंग को रथ में बिठाकर रथ खींचते हैं।

फाह्यान भारत भ्रमण वृतांत बौद्धिक लोगों के रथ खींचने की  उल्लेख की गई है। विजय नगर हंपी बे रथ आकृत बलबीर और रथ यात्रा की विवरण इतिहास से मिलता है। अतीत सिसिलि द्वीप रथ यात्रा आयोजित होने की प्रमाण मिलती है। इस तरह से अलग-अलग देशों में अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग लोक कथा  और पौराणिक तथ्य की उल्लेख मिलती है।

Rathyatra Bibaran in Hindi

रथ के बारे में

विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए प्रस्तुति  पहले से ही आरंभ हो जाता है। माघ महीने में बसंत पंचमी से रथ बनाने के लिए लकड़ी संग्रह किया जाता है। यह कार्य के लिए लकड़ी दिलाने का काम ओडिशा सरकार की होती है। वैशाख महीने में अखियां तृतीया रोहिणी नक्षत्र मैं पूजा अर्चना करके कार्य आरंभ करते हैं।

रथयात्रा में तीन प्रकार रथ व्यवहार किया जाता है। भगवान जगन्नाथ जी की रथ का नाम नंदीघोष है। रथ की उच्चता 23 हाथ। पांच हाथ परिधि, और इस रथ में 16 चक्के लगते हैं। इस रथ नंदीघोष की सारथी है मालती। रथ में सफेद रंग की चारों घोड़े लगे हुए होते हैं। रथ की चारों तरफ भला और काला रंग वस्त्र ढका हुआ होता है । रथ की शिखर पर चक्र तथा गरुड़ा विराजमान है।

बाला भद्र रथ का नाम है तालभोज। इस रात की उच्चता लगभग 22 हाथ। इसमें साढे चार हाथ परिधि विशिष्ट 14 चक्के लगता है। इस रथ के सारथी का नाम है सुद्युम्न तालभोज। यह रात नीला और लाल वस्त्र से चारों तरफ ढका हुआ होगा। रथ में जोड़ा गया 4 घोड़े का रंग काला होता है। रथ द्वार में स्थित पूर्ण कुंभ और फसल बलभद्र की सर्जनशीलता और धन ध्यान ऐश्वर्या प्रतीक है।

देवी सुभद्रा के रथ का नाम है दर्पदलन। इस रथ को देवदलाल, पदमा ध्वज और देवी रथ भी कहते हैं । इस रात के उच्च का 22 हाथ। चारी हाथ परिधि विशिष्ट 12  चक्के लगी हुई होती है। इसमें कृष्ण लोहित रंग से सजाई जाती है। इश रथ के सारथी है- अर्जुन। इस रथ में चार घोड़े लगे हुए होते हैं।

यात्रा

भगवान जगन्नाथ की जहां विश्वविख्यात रथ यात्रा या श्री गुंदीचा  प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल तृतीया तिथि में आयोजित किया जाता है। यानी कि देखा जाए तो जून या जुलाई के महीने में यह  रथ यात्रा आयोजित किया जाता है। इस रथयात्रा में भगवान और उनके बड़े भाई और बहन रथ में बैठकर गुंदीचा मंदिर को यात्रा करने के हेतु इसको गुंदीचा रथ यात्रा कहते हैं। रथयात्रा को 3 भाग में बांटा गया है- रथ यात्रा, गुंदीचा मंदिर में अवस्था और बहुडा यात्रा ।

रथ यात्रा दिन में तीनों रथ  को श्री मंदिर की सिंगर द्वार के सामने रखा जाता है। पहले भगवान सुदर्शन आकर सुभद्रा के रथ में अवस्था में होते हैं । मंदिर के साथ शिर्डी सुदर्शन पार करने के बाद बलभद्र के मूर्ति को रथ में लाते हैं । पहले के रीति के अनुसार सुभद्रा और जगन्नाथ को ही लाते हैं। सेवक लोग भगवान को पहांडी करके रत्न सिंहासन से रथ के ऊपर लाते हैं।

जब सारे भगवान रथ मैं आ जाते हैं तब भगवान का परम सेवक उत्कल गजपति रथ के ऊपर आकर भगवान के चारों तरफ चंदन कि पानी से चारों तरफ छिड़क देते हैं। इसको चेरापहँरा कहते हैं। यह दृश्य काफी आकर्षण। चेरापहँरा समाप्त होने के बाद रथ खींचा जाता है।

मजबूत और लंबे रस्सी से तीनों रथों को जोड़ा गया होता है। दर्शन करने आए हुए असंख्य नर नारी निर्देश पाने के बाद रस्सी खींचते हैं। पहले बलभद्र फिर सुभद्रा और आखिर में भगवान जगन्नाथ के रथ खींचे जाते हैं। रथ की रस्सी को छूने से कोटि-कोटि जन्मों का पाप दूर हो जाता है यहां लोगों का विश्वास।

मौसी मां तथा अर्धाशनि मंदिर के निकट में जगन्नाथ के रथ कुछ समय रुकता है। वहां पर पोढपीठा है भोग लगाया जाता है। इसके बाद बलगंडी तथा सरोदा वाली निकट में जगन्नाथ के रथ अपेक्षा में रहता है। कहते हैं राजा बलि जगन्नाथ को दर्शन करने आते हैं। तीनों रथों को संध्या सुधा गुंदीचा मंदिर के पास पहुंचाते हैं। सारी रात तीनों ठाकुर रथ में बिताने के बाद अगले दिन पहांडी होकर गुंदीचा मंदिर के अंदर रत्न सिंहासन में विजय करते हैं भगवान। 7 दिन तक भगवान वहां पूजा पाते हैं। नवम( 9बी)  दिन में तीनों ठाकुर को रात में बिठाकर जगन्नाथ मंदिर सिंघ द्वारा के निकट लाया जाता है। इसको बाहुडा यात्रा कहते हैं यानी कि भगवान वापस आते हैं श्री मंदिर में। 11 दिन तीनों ठाकुरों को रथ में ही सोने (gold पहना दिया  जाता है) मे तैयार किया  जाता है। इसको भगवान का सुना बेस कहते हैं। इसके अगले दिन रत्ना सिंहासन में भगवानों को अर्चना किया जाता है।

रथ यात्रा की आदर्श

हिंदू लोगों की गर्व और गौरव भगवान श्री जगन्नाथ के रथ यात्रा का आदर और महत्व आकाश के जैसे अनंत और सागर कि जैसी गहरी  है। विश्व कल्याण के लिए श्री जगन्नाथ दारू शरीर में श्री पुरुषोत्तम नाम से  अवीरभाव हुए  हैं। संसार की हित, दुखी लोगों की उद्धार और पापियों को प्रायश्चित रथ यात्रा का विशेषता  है। राथ में रथ आरोही श्री जगन्नाथ को दर्शन करने से व्यक्ति की जीवन सार्थक होता है और वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

गुंदीचा मंदिर मैं गया राथ को दर्शन करने से विष्णु लोग प्राप्ति होता है बोलकर ब्रह्म पुराण में उल्लेख है। व्यक्ति जितने भी बड़े हो जाए ना कहीं वहां भगवान के सेवक और दास है। राज धर्म सेवा के लिए  है . उत्कल के गजपति के रथ में झाड़ू लगाना रथ में चेरापहँरा देना यहां आदर्श के प्रचार करता है। रथ यात्रा में ना किसी का जाति देखा जाता है ना किसी का धर्म सबके लिए भगवान बाहर आते हैं  भक्तों को मिलने यह है रथ यात्रा का अन्यतम महत्व।  गुंदीचा और बहुडा यात्रा दोनों देखने से 44 चक्की की दर्शन होता है फल स्वरूप 44 नरक से उद्धार मिलता है।

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