Marxism of Karl Marx | मार्क्सवाद की मूल नीति

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हेलो दोस्तों आज हम जानेंगे कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों के बारे में | मार्क्सवाद क्या है– उसकी मूल नीति के बारे में पूरी जानकारी यह लेख में आपको देने की कोशिश की जाएगी ।

Contribution of Karl Marx: कार्ल मार्क्स की योगदान।

जर्मन के दार्शनिक कार्ल मार्क्स साम्यवाद के मुख्य प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। karl marx जर्मन की उनके समय के दार्शनिक George Hegel के द्वारा विशेष रुप से प्रभावित हुए थे। इसके अलावा Proudhan, Adam Smith, Ricardo और William Thomson के द्वारा भी  प्रभावित हुए हैं ।  Hegel की द्वंदात्मक आदर्शवाद सिद्धांत के द्वारा अनुप्राणित होके कार्ल मार्क्स खुद की द्वंदात्मक भौतिकवाद सिद्धांत की अवतारणा किए थे।

मार्क्सवाद की मूल नीति / Basic features of Marxism.

मॉडर्न युग में मार्क्सवाद एक प्रभावशाली राजनीतिक दर्शन है। जर्मन की प्रख्यात दार्शनिक कार्ल मार्क्स इस दर्शन की प्रवक्ता। उनके नाम के अनुसार इसका नाम मार्क्सवाद( Marxism) रखा गया। कार्ल मार्क्स स्कोर वैज्ञानिक समाजवाद नाम में बुलाते हैं।


कार्ल मार्क्स पूंजीवाद के विरोध में वह बोलते थे। यह पूंजीवाद समाज से शोषण, अन्याय और अत्याचार को दूर करने के लिए मार्क्सवाद कि सृष्टि हुआ है। Booksकार्ल मार्क्स एजेलश के साथ मिलकर Communist Manifesto  नाम से एक किताब रचना किए थे उसके अलावा वह Das Capital  नाम से अलग एक पुस्तक रचना किए थे।

1.    द्वंदात्मक भौतिकवाद (Dialectical meterialism)


मार्क्सवाद वैज्ञानिक समाजवाद की सारे सिद्धांत द्वंदात्मक वस्तु या तर्कसंगत भौतिकवाद के ऊपर निरंतर है। इस बारे में मार्क्स उनके समय के विशिष्ट लेखक ही Hegel के द्वारा प्रभावित हुए थे । हिजल के अनुसार चिंता धारा और भाव होते हैं चरम वास्तविकता। वास्तविक दुनिया है चिंता धारा की बाहरी परी प्रकाश। परिवर्तन 3 तरह से होता है । ईगल के अनुसार- वह तीन है :- पक्ष(Thesis  )या तथ्य ,  विरोधाभास या प्रतिपक्ष (Antithesis )और तीसरा है समन्वय (synthesis) । एक चिंता धारा की उसका विरोधी चिंताधारा भी होती है । यह दो विरोधी चिंता की सिंथेसिस( दो विरोधी चिंता धारा मिलने के बाद जो निकलता है) से एक नया चिंता धारा सृष्टि होता है। फिर से यही नया चिंताधाराबाद आगे जाकर पक्ष में परिणत होता है और उसका प्रतिपक्ष सृष्टि होता है लास्ट में synthesis की भी सृष्टि होता है। इस तरह से द्वंदात्मक प्रक्रिया निरंतर रूप से चला रहता है। 


George Hegel द्वंदात्मक प्रक्रिया द्वारा प्रभावित होकर कार्ल मार्क्स भी द्वंद को विकास का पथ बोलकर ग्रहण किए थे। लेकिन जॉर्ज हेगेल चिंता धारा के ऊपर गुरुत्व देते वक्त कार्ल मार्क्स वस्तु के ऊपर गुरुत्व देते थे। जॉर्ज हेगेल के अनुसार वास्तव में दुनिया चिंता धारा की बाहरी कड़ियां। लेकिन कार्ल मार्क्स जॉर्ज हेगेल के यह राय को खंडन किए हैं। उनके अनुसार समस्त क्रिया प्रतिक्रिया और आदर्श स्रोत वस्तु चिंता  धारा नहीं है । सामाजिक प्रगति तथा परिवर्तन कोई भी चिंता धारा तथा विचार द्वारा ना होकर वस्तु के गुण से होता है।


Karl Marx के चिंता धारा बजाएं वस्तु को संकल्पना बोलकर कहे हैं जो तर्कसंगत प्रक्रिया मैं विरोधाभास एवं संश्लेषण तथा समन्वय मैं बारंबार रूपांतरित होकर समाज की परिवर्तन और विकास करता चला आराहा है। इसको द्वंदात्मक तथा तर्कसंगत भौतिकवाद बोलकर कहा जाता है ।


2.    ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इतिहास की अर्थनीति की व्याख्या

George Hegel द्वारा प्रभावित होकर कार्ल मार्क्स ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इतिहास की अर्थनीति की व्याख्या संबंधी सिद्धांत दिए है। इस थ्योरी को वह मनुष्य की अर्थनीति और सामाजिक जीवन में भी प्रयोग किए हैं।


Karl Marx के अनुसार अर्थनीति है समाज की मूल बातें तथा निम्न संरचना । निम्न संरचना के ऊपर खड़ा है कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, कानून इन सभी को समाज की ऊपरी संरचना कहते हैं। निम्न संरचना तथा अर्थनीति स्तर पर कोई परिवर्तन  हुआ तो समग्र ऊपरी संरचना को हिला कर रख देता है। अन्य अर्थ में कहे तो समाज मे कला, साहित्य, विज्ञान, सामाजिक स्थिति, राजनीतिक अवस्था, आदि आर्थिक अवस्था द्वारा प्रभावित होता है। 


कार्ल मार्क्स के अनुसार मानव समाज में इतिहास विभिन्न चरण देकर गति करता है। वह सारी है- आदिम समाज (Primitive Society), दास सामान (Slave Society), संभ्रांत समाज( Feudal Society), पूंजीपति समाज( Capitalist Society और साम्यवादी समाज (Communist Society) . 
इतिहास की विभिन्न चरण में मानव समाज धानी-निर्धन तथा शोषक- शोषित , इन दो श्रेणी में विभाजित होकर आई है जो श्रेणी संघर्ष तथा अर्थनीति  शक्ति की अधिकारी हुई है, वही श्रेणी अन्य श्रेणी  को शोषण करता चला जा रहा है। इसको परिवर्तन करने के लिए तथा श्रेणी विहीन या शोषण विहीन समाज गठन करने के लिए भौतिकवादी शक्ति तथा अर्थनीति शक्तिमान तथा उत्पादन और विनिमय प्रक्रिया पुनर्निर्माण के ऊपर कार्ल मार्क्स गुरुत्व दिए थे। इसके द्वारा श्रेणी बीहिंद समाज गठन हो पाएगा बोलकर कहे थे।


3.   अतिरेक मूल्य( Surplus value )


अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत मार्क्सवाद कि अन्य एक प्रधान उपादान है। पूंजीवादी शोषण के ऊपर रोशनी डालने के लिए कार्ल मार्क्स सिद्धांत दिए है। उनके अनुसार केबल श्रमिक की श्रम द्वारा किसी भी उत्पादित द्रव्य की बाजार चाहिदा और मूल्य सृष्टि होता है। इसलिए द्रव्य की समुदाय बाजार मूल्य पाने के लिए श्रमिक हकदार है। लेकिन वास्तव में वह नहीं पाता । उसकी पूंजीपति मालिक उसको उसकी श्रम के लिए कुछ पारिश्रमिक मजूरी आकार में देता है। द्रव्य की समुदाय बाजार दर को श्रमिक की पारिश्रमिक बा मयूरी को अलग करने से जो बाकी बचा हुआ मूल्यों रहता है उसे अतिरेक मूल्य बोलकर कहते हैं। यानी कि किसी द्रव्य की उसकी सारी खर्च( श्रमिक की मजबूरी भी शामिल है)  हटा दे तो जो बचता है यानी कि प्रॉफिट- उससे ही अतिरिक्त मूल्य कहते हैं । इस प्रॉफिट को पाने का हकदार श्रमिकों का भी होता है। लेकिन उसकी पूंजीपति मालिक उसको नहीं देता खुद ही रख लेता है। इस तरह से बारंबार शोषण करके पूंजीपति अधिक से अधिक धनी होते हैं और श्रमिक दरिद्र होते जाते हैं।

4.   श्रेणी संघर ( Class struggle )


एंजेल्स के साथ कार्ल मार्क्स एक पुस्तक लिखे थे जिसका नाम है साम्यवादी इश्तहार ( Communist Manifesto) के प्रथम अध्याय में यह दर्शाया गया है कि अभी तक देखा जा रहा समस्त समाज की इतिहास है श्रेणी संघर्ष की इतिहास।(” The history of all hitherto existing society is the history of class struggle”) इतिहास के प्रत्येक चरण में समाज मुख्यतः दो श्रेणी में विभक्त है- एक है धनी और दूसरा है निर्धन तथा शोषक और शोषित। कार्ल मार्क्स के अनुसार स्वाधीन नागरिक और कृत्य दास, जामी मालिक और किसान, पूंजीपति और श्रमिक , haves and have nots एक ही बात में अत्याचारी और पीड़ित- इन दो परस्पर के विरोध में खड़े होते हैं एवं इन लोग के बीच में निरंतर रूप से संघर्ष चलता आ रहा है। इस संघर्ष एक अविरत और असरांती संग्राम कारण दोनों श्रेणी परस्पर घोर विरोधी।

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