मनु के जीवन परिचय| मनुस्मृति के बारे में पूरी जानकारी | दंड व्यवस्था |सामाजिक व्यवस्था

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मनु के जीवन परिचय

मनु एक ऐतिहासिक चरित्रों होने के बावजूद उनकी जीवन काल (period)   के बारे में इतिहासकारों ने सटीक रूप से वर्णन नहीं दे पाए हैं। विद्वान , विचारक एवं लेखकों की बीच में मत अंतर होने के कारण महर्षि मनुकी जन्म तथा जीवनकाल की सटीक गणना अभी तक अनिश्चित होकर रही है।

सार विलियम  जॉन्स के अनुसार मोनू ईसा पूर्व 1200 जन्म काल बोलकर अपनी राय दिए हैं एवं आर.जी. भंडारकर मनू को द्वितीय शताब्दी के माध्यम और पंचम शताब्दी सेष के बीच के का काल बताएं हैं । इसी तरह से आपकी मोनू को शताब्दी के आरंभ काल तथा उसके पूर्व कल बताए हैं।

आश्चर्यजनक रूप से कितने विद्वान और शोधकर्ता मोनू को द्वादशा तथा तेरहवीं शताब्दी क्यों बोल कर वर्णन किए हैं। लेकिन बी.ए. सेलटोरे मनु की जीवनकाल को ईसा पूर्व 1900 से 1800 के बीच में बोलकर मत दिए  है. इसलिए महर्षि मनु की रहस्यमई जीवन काल के बारे में पुख्ता गणना नहीं हो पाया है। मनु की जीवन काल की गणना केवल एक-एक संभावना .

मनु (Manu) नाम कैसे आया

” मनु “ शब्द एक संस्कृत शब्द जिसका अर्थ है मनोवैज्ञानिक अस्तित्व ।  और के ही लोगों का विश्वास है कि मनू विश्व निर्माता ब्रह्मा जी के संतान है। और कितने लोगों की राय में “मानव” शब्द की मूल “मनु” शब्द से सृष्टि हुआ है। श्री अरविंद के अनुसार मनु एक संकेत व्यतीत और कुछ नहीं।

मनुस्मृति

महर्षि मनु के द्वारा लिखी गई पुस्तक को कहा जाता है मनुस्मृति तथा मनु संहिता । महर्षि मनु के द्वारा लिखी गई यहां उत्कृष्ट कृति जो हिंदू धर्म, समाज और जीवन शैली के बारे में विशेष सूचना प्रदान करता है। संकलन श्रुति के बीच में मनुस्मृति ही रेस्ट बोलकर विचार दिया गया है।

मनुस्मृति हिंदू विधि की मूल बातें  हैं एवं यहां आज भी किसी ना किसी रूप से हिंदू विधान और नीति शास्त्र के क्षेत्र में जरूरत तथा उपयुक्त होता है। सामूहिक आवेदन और प्रयोग द्वारा इसकी प्रकृति सारा विश्व जानता है। वेद की तत्व को आधार करके इसकी रचना की गई है। मानव जीवन और आचरण की सभी दिशाओं को  स्पष्ट  करता है .

मनुस्मृति महर्षि मनु के द्वारा लिखी गई पुस्तक है जो हिंदू धर्म, समाज और जीवन शैली के बारे में बताता है कि मानव जीवन और आचरण कैसा होना चाहिए सभी दिशाओं में स्पष्ट रूप से दिखाता है . मनुस्मृति में कूल 12 अध्याय है और 2694 श्लोक है।

प्रथम अध्याय
मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में ब्रह्म की सृष्टि, जल, ब्रह्मांड, तीनी वेद, काल, महाकाश, पुरुष और नारी, देवता, दानव,  दीन – रात्रि, चार युग, ब्राह्मण और अन्य वर्ग, स्वर्ग और नरक कर्म, पाप और पुण्य विषय में आलोचना की गई है।

द्वितीय अध्याय
द्वितीय अध्याय में धर्म, धर्म शास्त्र, इच्छा और अभिप्राय, तथा नर्क प्राप्ति की मार्ग, मोक्ष, वेद की उपयुक्त अध्ययन और वैदिक श्लोक के उच्चारण तोहरा दुर्गुण विनाश, विभिन्न संस्कार और ब्रह्मचारी के विषय में इस अध्याय में आलोचना की गई है।

तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय में आठ प्रकार के विवाह, अच्छे और बुरे विवाह, विवाह के लिए योग्य और अयोग्य कुमारी, सुखी वैवाहिक जीवन,  स्त्री आनंद और नीरानंद, निषिद्ध यौन जीवन, अंतर जाति विभाग परिणाम आदि के बारे में वर्णन किया गया है।

इस अध्याय में श्राद्ध करने की विधि पद्धति, सद्गुण,  विद्या दान की पद्धति और उपकारिता अतिथि के प्रति गृहस्थ कर्तव्य, समलैंगिक जीवन के ऊपर भी प्रशंसा उल्लेख की गई है .

चतुर्थ अध्याय
मनुस्मृति की चतुर्थ अध्याय में चार वर्णों की नियम और गृहस्थ आश्रम, यौन संपर्क नियम,  स्नान , भोजन, प्रार्थना और सूर्य दर्शन के बारे में वर्णन करी गई है. इसके  में राजा के दान अस्वीकार,  शुद्र राजा और शत्रु परिहार,  प्रतिमा और ब्राह्मण असम्मान निषेध, विनम्रता और सत्यवादी था कि पुरस्कार इत्यादि बारे में अनुचित हुआ है।

पंचम अध्याय

मनुस्मृति के पंचम अध्याय में स्वामी और स्त्री की कर्तव्य, मौत की कारण, खाद्य-अखाद्य , मांस भक्षण निषेध, विषय में वर्णन की गई है। 

छोटे अध्ययन
अभी तक अपडेट नहीं की गई

सप्तम अध्याय
मनुस्मृति की सप्तम अध्याय में राजा, राजा के कर्तव्य, मंत्रियों के गुण और नियुक्ति प्रणाली, भ्रष्ट कर्मचारी को दंड, कर प्रधान, शत्रु नियंत्रण और दमन,  राजा का भोजन और शयन नीति विषय में वर्णन की गई है

अष्टम अध्याय
मनुस्मृति के अष्टम अध्याय में आयन और उसके प्रयोग, न्याय, साक्षी, विभिन्न प्रकार और परिमाण के दंड,  रूण और शुध,  वाणिज्य- व्यवसाय, पाटीदार नारी प्रति राष्ट्र की कर्तव्य संपर्क बारे में वर्णन की गई है।

नवम अध्याय
मनुस्मृति की नवम अध्याय में सामाजिक संगठन के विभिन्न आदेश जेठा नारियों की कर्तव्य, उनके सुरक्षा, भर्ती , छह प्रकार  स्त्रीधन, बुरे कर्म, अवैध यौन संपर्क के लिए पश्चाताप आदि के बारे में आलोचना की गई है।

दशम अध्याय
वर्णों के बीच संपर्क, व्यवहार नियम और ढांचा, ब्राह्मण लोगों को गुरुत्व, उछ और नीच श्रेणी लोगों के बीच अंतर आदि विषय में मनुस्मृति कि इस दशम अध्याय में  वर्णन की गई है।

11 वा अध्याय
छात्रों को शिक्षा प्रदान करने के नियम, यज्ञ विधि, पशु हत्या समेत विभिन्न पाप और पश्चाताप, आदि के बारे में आलोचना की गई है।

12 वीं अध्याय
12 वीं अध्याय तथा मनुस्मृति की शेष अध्याय में कर्म, स्वर्ग और नरक, शरीर पंचभूत, विभिन्न कर्म के परिणाम और विभिन्न प्रकार प्राणी की पुनर्जन्म के लिए कर्मों के बीच प्रभेद आदि आयोजित हुई है।

मनुस्मृति के अनुसार राजा का कर्तव्य

मनु खुद कहा है कि प्रचलित अव्यवस्था, पारस्परिक मतभेद, शत्रुता , और असंगत के कारण विचलित लोग कदापि सुख और आराम में नहीं थे। आइन व्यवस्था अभाव के कारण समाज में अराजकता

मनु के दंड व्यवस्था (Manu’s Theory of Danda in Hindi)

मनु की समग्र राजनीतिक दर्शन उनके दंड तत्व को केंद्रित कर कर लिखी गई है। अर्थात मोनू की राजनीतिक दर्शन दंड के चारों तरफ घूमती है । दंड केवल राष्ट्र के अंदर शांति श्रृंखला बनाए नहीं रखता बल्कि बुरे को अच्छे मैं परिणत करना एवं मोटा मोटी रूप से जनता की सुख और कल्याण साधन करने में आश्चर्यजनक फल  प्रदान करना।

दंड एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक निवारक (psychological deterrent ) है एवं बुरे और अच्छे कार्य तथा इस सभी कार्यकर्ता के विरोध में एक निवारक व्यवस्था है। अर्थात बुरे काम करने से लोगों को रोकने का एक व्यवस्था है दंड तत्व । दंड भय की मूल आधार है एवं भय शांति की व्यवस्था धारा है ।

विचार व्यवस्था

किसी को दंड देने से पहले उसके ऊपर आरोप होता है और उस आरोप को राजा के सामने सिद्ध करना पड़ता है। राजा इसके ऊपर किस तरह विचार लेते हैं उस बारे में थोड़ा जान लेना जरूरी है। महर्षि मनु के अनुसार राजा न्याय की एक सोर्स है।

मनुस्मृति के अनुसार राज्य में शांति शुक्ला रक्षा करने के लिए राजा एक विचार विभाग स्थापन करना आवश्यक है . इस विचार विभाग का स्वयं राजा, पुरोहित, मंत्री परिषद तथा साखी को लेकर गठित होना आवश्यक है. मनु के अनुसार राजा उत्तम पोशाक पहन के परिषद के साथ सुसज्जित होकर न्यायालय ते हैं.

लोन, छुट्टी भंग, चोरी, नारी , अपहरण, सीमा इस तरह की 8 प्रकार विषय में मनुस्मृति के अनुसार राजा विचार व्यवस्था में लिखी गई है। इसके अलावा देवानी और फौजदारी मुकदमा के लिए भी विचार कर सकते हैं राजा .

राजा नया प्रदान करने के समय साक्षी और प्रमाण विचार में लेकर न्याय देंगे। मनु के अनुसार विचार व्यवस्था में साक्षी लोग एक महत्वपूर्ण  स्थान  ग्रहण करते हैं। ब्राह्मण ब्राह्मण के लिए साक्षी दे सकता है और नारी नारी के लिए साक्षी प्रदान कर सकता है, साक्षी का अर्थ है गवाही। चांडाल, सन्यासी, ब्रह्मचारी, बुद्ध, शराबी, चोर, पागल साक्षी देने के लिए चुने नहीं जाती।

महाजन और अरुण करता के बीच में कोई भी विवाद दिखाई दिया तो महाजन 3 साखी देने की व्यवस्था है। किसी भी हत्या मामला को जानने वाले लोगों को साक्षी रूप में ग्रहण किया जा सकता है,  यदि इस मामले में कोई भी साथी ना मिला तो. इन सभी मामलों में नारी, बुद्ध,  बालक को भी साक्षी के रूप में लिया जा सकता है. यदि बारंबार अनुपस्थिति रहते हैं, झूठी गवाही  प्रदान करते हैं , यदि घटना की व्यतिक्रम करते हैं इस मामले को रद्द किया जा सकता है। मनु के अनुसार एक व्यक्ति अपनी कन्या की विवाह के लिए झूठी गवाही प्रदान कर सकता है, यदि इसी तरह गवाही के मत अंतर दिखाई दे तो उस समय संख्या गरिष्ठ तथा गुणात्मक कथा ब्राह्मणों की बात को विचार में लिया जाएगा।

देवानी विचार

एक राजा दुखी, विधवा, अनाथ लोगों की संपत्ति की सुरक्षा करना आवश्यक है। यदि  कोई भी अज्ञात व्यक्ति की संपत्ति है तू राजा व संपत्ति को 3 साल तक घोषणा करते हैं यदि उस संपत्ति की कोई दावेदार नहीं आया तो राजा अपने पास रख लेते हैं.

यदि कोई भी व्यक्ति गुप्त धन पाता है तो राजा कर के रूप  में उसमें से 6 भाग में 1 भाग ले जाएंगे। महाजन बंधक संपत्ति को व्यवहार नहीं करेंगे लेकिन पिता घर के कामों के लिए कर्ज को पुत्र लौटाने के लिए बाध्य होते हैं। पागल, वृद्ध, शिशु इन सारे लोग लोन नहीं ले सकते.

यदि पिता माता एक कन्या को दिखाकर दूसरे कन्या के विवाह करा दिया जाए तो, उस परिस्थिति में दूल्हा वह दोनों को विवाह कर सकता है. यदि किसी को जोर जबरदस्त छुट्टी पत्र में हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया है तो उस परिस्थिति में राजा उस छुट्टी तथा समझौता को रद्द कर सकते हैं। गांव की किसी भी समझौता को यदि कोई गांव की लोग भंग करते हैं तो उस परिस्थिति में उसे गांव से बाहर कर देना ही सही है।

किसी भी द्रव्य की खरीदारी में यदि क्रेता और विक्रेता के बीच में मतातंर दिखाई दे तो , उस परिस्थिति में क्रेता उस द्रव्य को 10 दिन के अंदर लौट आने की प्रावधान है।

फौजदारी विचार
यदि कोई ब्राह्मण, क्षेत्रीय, वैश्य द्वारा अपमानित होते हैं उस समय दंड दिया  जाता है। यदि शुद्र इस तरह के दोष करता है तो उसे कोड़े की मार से दंडित किया जाता है। यदि कोई दुर्घटना घटता है और उससे कोई भी व्यक्ति आघात होता है तो समय दोषी को दंड दिया जाता है, लेकिन वाहन असुविधा हेतु दुर्घटना घटता है तो दोषी किसी को नहीं माना जाता।

मालिक की अज्ञात तथा जोर जबरदस्त घर की चीजों को हरण करें तो वह छोरी कहलाता है। पशु चोरी करने से आर्थिक दंड दिया जाता है। धन, अलंकार, खाद्य, वस्त्र जैसी चीजें चोरी करने से चोर को द्रव्य के साथ 2 गुण अर्थदंड से दंडित करने की प्रावधान होना उचित है। यदि कोई व्यक्ति राजकोष भंडार और शस्त्रागार से चोरी करता है तो उसे मृत्यु दंड दिया जाता है . यदि कोई तंत्र मंत्र करके किसी भी चीज को हानि पहुंचाता है वह भी दोषी करार क्या जाएगा.

मनु की सामाजिक व्यवस्था

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