महात्मा गांधीजी के 4 नैतिक आदर्श । Gandhi Philosophy in Hindi

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गांधीजी के  नैतिक आदर्श इन हिंदी

यह लेख में जानेंगे महात्मा गांधी जी की आदर्श और उनकी जीवन प्रति दी गई दिग्दर्शन । महात्मा गांधी को एक ही समय में एक दार्शनिक , राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक एवं अहिंसा और सत्य की प्रतिमा की अवतार के रूप में वर्णन या जाता है। उनकी शिक्षा दर्शन आज के जीवन दर्शन में दिखाई देता है। प्राचीन भारत की आध्यात्मिक दर्शन द्वारा वह विशेष रूप से प्रभावित हुई थे उससे काफी प्रेरित हुए थे एवं उनकी दार्शनिक मत बाद मे प्राचीन भारतीय दर्शन की झलक दिखाई देता है। आध्यात्मिकता गांधी दर्शन की मूल सिद्धांत। उनकी जीवन की कुछ दिखाएं है-  ईश्वर उपासना, सत्य की साधना अहिंसा और सत्य 


ईश्वर की उपासना( worship to Divine)


महात्मा गांधी ईश्वर की अनंतता को विश्वास करते थे यानी कि भगवान के प्रति उनकी असीमित विश्वास था। उनके कहने के अनुसार “ईश्वर ही सत्य एवं सत्य ही ईश्वर” , ईश्वर सत्य, शिवा, सुंदरम । वहां अपनी जीवन दर्शन में लिखे हैं  “30वर्ष काल जो मैं पाने की इच्छा जताया उसके लिए मैं अनेक प्रयास किया एवं जिसके लिए मैं अत्यंत व्याकुल हुआ वह है आत्मा की उपलब्धि भागवत साक्षात्कार लाभ और मोक्ष प्राप्ति”। इस जीवन की लक्ष्य के अनुसार मेरा जीवन, मेरा कर्म एवं मेरा अस्तित्व । मैं जो कुछ करता हूं , जो कुछ लिखता हूं , राजनीतिक क्षेत्र में मेरी समस्त प्रतिष्ठा ईश्वर की दिखाएं रास्ते के आधार पर ही करता हूं। वह कहते हैं “मानव सेवा द्वारा ही भगवान की दर्शन मिलेगा”।


सत्य की साधना (Quest of Truth )

सत्य और अहिंसा  गांधी के दर्शन की मूल सिद्धांत। गांधीजी के अनुसार लक्ष्य और दृष्टिकोण के बीच में कोई अंतर नहीं है। वह एक और समान। इस तरह सत्य  गांधी जी की दर्शन की एक लक्ष्य एवं अहिंसा उसकी रास्ता। वह कह रहे हैं सत्य के अलावा अन्य कोई भी ईश्वर की आराधना करना आवश्यक नहीं है। सत्य की साधना, ही प्रत्येक मनुष्य की लक्ष्य पर कर्तव्य होना चाहिए।
आदर्श जीवन यापन के लिए सत्य की उपलब्धि करना आवश्यक होता है। अच्छे व्यवहार, चिंता भावना , अच्छे उद्देश शुद्धता और आत्मीयता के ऊपर  जीवन की श्रेष्ठ काम सत्य के ऊपर निर्भर है। गांधी जी के सत्याग्रह, शुद्ध आदर्श के द्वारा ही सफल हुआ था। सत्य के ऊपर आधारित समाजवाद प्रतिष्ठा गांधीजी मुख्य उद्देश था।

अहिंसा ( Non-violence)


सत्य की साधना के लिए एकमात्र रास्ता वह है अहिंसा। गांधी जी की अहिंसा की परिकल्पना बहुत ही व्यापार और गंभीर । वह कहते  हैं -जानवरों की हिंसा जिस तरह प्राकृतिक है सत्या, अहिंसा मनुष्य प्राकृतिक धर्म है। उनके अनुसार मनुष्य हिंसा को छोड़कर अहिंसा को अपने जीवन की एक कर्तव्य के रूप में देखना चाहिए। सभी के प्रति सभी जीवो के प्रति हिंसा व्यवहार ना करके अहिंसा दिखाना चाहिए। अहिंसा मनुष्य की कमजोरी की पहचान नहीं है बल्कि अहिंसा एक आध्यात्मिक शक्ति जोकि नैतिक बल की पहचान देता है। शत्रु को आघात करने के बजाए उससे प्यार करना ही आध्यात्मिक शक्ति की अनिश्चित है। इसे ही कहते हैं अहिंसा नीति।


सत्यता ( Trust )

गांधी जी के जीवन दर्शन के मूल मंत्र सत्य और अहिंसा है। वह थे सत्य और अहिंसा के एक उत्कृष्ट साधक। सचिन तान्या विचार और सोच कहना बच्चे लोगों की जीवन सरल और सुंदर करता है। गांधीजी एक ऐसी समाज की ख्वाब  देखते थे जिसमें हिंसा , जलन, छल कपट, निंदा के बिना अहिंसा और शांतिपूर्ण जीवन यापन का लाभ करा जा सकता। मनुष्य शिशु सत्य मार्ग में परिचालित हुए तो समस्त लोगों के प्रति समस्त के लिए प्रेम, ममता के भाव जागेगा।
अहिंसा सत्य के अंतर्गत। सत्य की आविष्कार के लिए अहिंसा आवश्यक उपाय है। अहिंसा इस तरह एक अस्त्र है जिसके अंदर असीम शक्ति है। यह नामर्द की पहचान नहीं बरंम वीरता की श्रेष्ठ धर्म ।


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