कोणार्क मंदिर में पूजा क्यों नहीं होती, क्या है रहस्य | Konark Sun Temple in Hindi

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आज हम जानेंगे ऐसी एक मंदिर के बारे में जहां पूजा किया नहीं जाता लेकिन हजार हजार लोग वहां रोज आते हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं कोणार्क सूर्य मंदिर(Konark Sun Temple) में जो ओड़ीसा के लिए ही नहीं पूरे भारत के लिए एक गर्व की बात है जो हजार हजार विदेशी पर्यटक को अपनी सौंदर्य कलाकृति के लिए दृष्टि आकर्षण करती है।

कोणार्क सूर्य मंदिर (Konark Sun Temple in Hindi)

ओड़ीसा राज्य में बहुत दर्शनीय स्थान दिखा जाता है। इन सारे स्थानों में से जगन्नाथ मंदिर पुरी, सूर्य मंदिर कोणार्क, बारबाटी, चिलिका लेक पुरी, खंडगिरी खोरदा, लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर, कपिलास मंदिर, शंकर नारायण जी के मंदिर हरिशंकर और घटगांव की तारा तारिणी मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थान है। इन सारे स्थान गौरवशाली उत्कल इतिहास के लिए एक एक बेदीका समान है। साम्राज्य गठन, सुशासन, साहस, शिल्प, धर्म, साहित्य और आर्किटेक्चर महियान ओड़ीसा की पवित्र भूमि में दर्शनीय स्थान की कोई अभाव नहीं है।

Konark Sun Temple

Konark Sun Temple in hindi 

उत्कल यानी कि ओड़िशा, पुरातन युग में ओडिशा को उत्कल कहा जाता था। इस भूमि के दर्शनीय स्थानों   में से कोणार्क  सूर्य मंदिर कुछ अलग है। इस कोणार्क सूर्य मंदिर को राजा लागूंला नृसिंहदेव ने बनवाया था ।1245 AD  मंदिर निर्माण कार्य आरंभ किया गया था और 1256 AD समाप्त हुआ था। 1200 शिल्पी मिलकर मंदिर निर्माण कार्य समाप्त किए थे । इन शिल्पी कारों में से विश्व महाराणा थे सबसे प्रधान। प्रतिदिन देश विदेश से बहुत लोग यहां  घूमने के लिए आते हैं। कोणार्क पर्यटक के लिए एक आकर्षण का केंद्र है। तो आइए जानते हैं कोणार्क के बारे में कुछ और बातें ।

• अवस्थिती (Location )

कोणार्क ओड़ीसा के पुरी डिस्टिक  में अवस्थित है। यह भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है। यह मंदिर पूरी से प्राय 35 किलोमीटर दूर अवस्थित है। इस प्रसिद्ध स्थान को जाने के लिए पूरी या भुवनेश्वर से पीपीली और निमापड़ा होकर Bus में जाना पड़ेगा । यह मंदिर समुद्रतट पर अवस्थित है। यह जगह अक॔क्षेत्र नाम पर परिचित है। इसके साथ साथ इस से पदमक्षेत्र और मित्रबन भी बुलाया जाता था । ओड़ीसा की प्रमुख चार क्षेत्रों में से कोणार्क है कुछ अलग। इसकी अवस्थिति समुद्रतट पर होने के कारण स्वास्थ्य के लिए परिवेश अनुकूल है । कोणार्क के पास अवस्थित चंद्रभागा और रामचंडी मंदिर पर्यटकों को बेस आकर्षित करता है।

कोणार्क मंदिर की विवरण

वर्तमान कोणार्क में जो मंदिर अवस्थित है ,वह प्रमुख मंदिर नहीं है। यहां मंदिर का एक मुख्य मंडप है । पहले यहां तीन मंडप हुआ करता था। नष्ट हो गया दो मंडप कोणार्क का मुख्य मंदिर हुआ करता था । दो मंडप नष्ट होने के बाद इसको पूरी तरह से मंदिर कहा नहीं जा सकता। समय के साथ बाहरी आक्रमण की वजह से मंदिर का अधिकांश भाग नष्ट हो गया। प्रमुख मंदिर का ऊंचाई था 68 मीटर, लंबाई 257 मीटर और 4 मीटर ऊंचा एक विराट दीवार द्वारा घीरा हुआ था । इस दीवार की चौड़ाई था लगभग 10 मीटर। समग्र मंदिर एक रथ की आकार में निर्माण किया गया है। इस रथ में 12 पहिए लगा हुआ है । एक पहिए की डायमीटर लगभग 3 मीटर है । यह पहिए मंदिर का मुख्य आकर्षण केंद्र है क्योंकि यह पहिए घड़ी की तरह समय बताने की काम करती है। इसलिए तीन पहियों  को धूप घड़ी भी कहा जाता है।


इस रथ में 7 घोड़े भी है जिनको सप्ताह के 7 दिनों का प्रतीक माना जाता है। ऐसा लगता है कि यह घोड़े मंदिर को खींच के ले जा रहे हैं। इसके साथ-साथ इसकी कलाकृतियां , उत्कल शिल्पी कला वेस आकर्षण है ।समय के साथ प्रमुख मंदिर नष्ट हो गया वर्तमान केवल मुख्य मंडप ही विद्यमान है । 


इस मंडप की ऊंचाई 48 मीटर है। कोणार्क का अरुणस्तंभ मराठा लोगों के द्वारा श्रीक्षेत्र (पूरी-जगन्नाथ भगवान की निवास स्थान ) में लाया गया था जो पुरी जगन्नाथ मंदिर के सिंघद्वार मैं स्थापन किया गया है। कोणार्क के सूर्य मंदिर इस तरह से निर्माण करा गया है कि जो सूर्य उदय का प्रथम किरण भगवान के स्थान में जाकर पड़ता है यह लोगों का कहना है। मंदिर की गहरे रंग की वजह से इसको काला पगोड़ा भी कहा जाता है।

कोणार्क मंदिर में पूजा क्यों नहीं होती?

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल जरूर आती है कि इस मंदिर में पूजा क्यों नहीं होती, दुनिया के धरोहर में से सूर्य मंदिर कोणार्क एक है। यह भगवान सूर्य देव को समर्पित करके बनाया गया है फिर इस मंदिर में पूजा क्यों नहीं किया जाता। वैसे तो इसके पीछे बहुत सारे कारण है, और वह सारे दुविधाएं भी है।

कोणार्क का सूर्य मंदिर अधिकांश चीजें नष्ट हो गया  है । वर्तमान के समय में जो है वही मंदिर का मुख्य मंडप है। वर्तमान इस मंदिर मेंकोई पूजा नहीं किया जाता । कहते हैं कि 16 वीं शताब्दी के दौरान इस मंदिर से सूर्य देव का मूर्ति हटाई गई तब से  इस मंदिर में पूजा होना बंद हो गया। फिर लोगों ने मंदिर को आना भी बंद कर दिया। इस तरह चलते चलते मंदिर पूरी तरह बंद हो गया। समय के साथ नगर विरान होकर जंगल के रूप में बदल गया। फिर कई सदियों के बाद इस मंदिर को खोजा गया।

हिंदू धर्म के अनुसार – हिंदू मान्यता के अनुसार जिस मंदिर में भगवान का बास ना हो वहां पूजा नहीं किया जाता । कोणार्क  से सूर्य देव की मूर्ति हटाने के बाद यहां पूजा होना बंद हो गया। इस मंदिर में पूजा ना होने के कारण यह भी बताए जाते हैं। और कहते हैं खंडित मंदिर में पूजा करना शुभ माना नहीं जाता।


मंदिर खोजा जाने के बाद देखा गया की मंदिर की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। और इसकी कुछ  हिस्से पूरी तरह से नष्ट हो गया था। आज के समय में बात करें तो इस मंदिर का एक ही मंडप बचा हुआ है जिसको आज मंदिर का प्रधान मंडप माना जाता है।


इस मंदिर के अंदर जाने की रास्ते को आज से 118 साल पहले पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। इस मंदिर को बंद करने के पीछे का कारण है 11 वीं शताब्दी के अंत होते-होते इस मंदिर का आखिरी मंडप भी कमजोर होकर गिरने की कगार में थी और इससे बचाने के लिए साल 1903 मे उस समय के गवर्नर John Woodburn ने इस मंदिर के अंदर रेत भरवा के मंदिर की दरवाजे को पूरी तरह से बंद करवा दिया था। जिससे मंदिर गिरने से बचाया जा सके।


ऊपर लिखित कारणों से और प्रमुख मंदिर ना होने के कारण यहां पूजा नहीं किया जाता है। हमेशा दरवाजा बंद रहता है। क्या कहते हैं दोस्तों इस मंदिर के अंदर भरे बालू को हटा देनी चाहिए और  फिर से सूर्य देव की मूर्ति स्थापन करके पूजा करनी चाहिए आपकी राय हमें जरूर बताइए

पौराणिक कथा

कोणार्क मंदिर गंग वंश के सामंत राजा लागंला नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। कोणार्क को पहले मित्रबन, पदमक्षेत्र, अक॔क्षेत्र बुलाते थे। बाद में कोणार्क नाम से नामकरण कर दिया गया। कोणार्क शब्द, ‘कोण’ और ‘अर्क’ शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा । एक बार श्री कृष्णा अपने पुत्र सांब को अभिशाप दिए थे । अभिशाप से मुक्त होने के लिए सांब अपने पिता श्री कृष्णा को बहुत पर्थना किए थे। सांबा की व्याकुलता देखकर श्री कृष्ण को दया आया । कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए सांब को एहां   अक॔क्षेत्र मैं सूर्य भगवान का उपासना करने के लिए श्री कृष्ण ने निर्देश दिए थे। सांब ने इस जगह सूर्य देवता का पूजा करके रोगमुक्त हुए थे। इस तरह से इस क्षेत्र की पौराणिक विशेषता दिखाई देता है। इसी कारण से उत्कल के गंगवंशज  राजा लागूंला नृसिंहदेव सूर्य भगवान की पूजा करने की खातिर मंदिर निर्माण के लिए यह जगह को चुने थे।

कोणार्क का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कोणार्क का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बेस जिज्ञासु जनक है । इतिहासकार मानते हैं कि यह मंदिर 750 साल से भी अधिक ज्यादा पुराना है। तत्कालीन गंग वंश का राजा लागूंला नृसिंहदेव ने 1245 AD को कोणार्क मंदिर निर्माण कार्य आरंभ किया गया था और 1256 AD समाप्त हुआ था । मंदिर निर्माण में 1200 कारीगरों ने अपनी कार्य दक्षता दिखाई थी। विश्व महाराणा थे मुख्य कारीगर। इस कोणार्क मंदिर निर्माण के बारे में  ओड़ीसा के लोगों में बेस किंवदंतियों सुनी जाती है जथा-“राजा नृसिंहदेव  के मंत्री गरम खीरी में हाथ दाल के उंगली जलाने की कथा, विश्व महाराणा का एकलौता पुत्र 12 साल का बालक धरमा जो मंदिर की कुंभ निर्माण करके अपनी जाति भाई कि जीवन रक्षा के लिए अपनी जीवन का बलिदान देना” आदि एक-एक किंवदंतियों। ए किंवदंतियों की ऐतिहासिक सत्यता के विषय में इतिहासिकार भी कोई निष्पत्ति नहीं दे पाए हैं। इसमें पता चलता है  यह किंवदंतियों इतिहास में शिकृति प्राप्त नहीं है।

इतिहासकारों का विश्लेषण

कोणार्क मंदिर की शिल्पी कला और भास्कर विश्व में फैला हुआ है। अतीत काल में उत्कल का यह एक प्रधान बंदरगाह था। उत्कल या व्यापारी इस बंदरगाह देकर आदि राज्यों में जाते थे, व्यापार करके ओडिशा को समृद्ध और उन्नत बनाए थे । मंदिर की पत्थरों में लिखा गया शिलालेख अतीत की उत्कल की समृद्धि  जीवन समाज को दर्शाती है।

अन्य आकर्षण

कोणार्क से कुछ दूर चंद्रभागा मंदिर अवस्थित है । यह समुद्र तट पर विद्यमान है। प्रतिवर्ष माघ के महीने सप्तमी तिथि मैं यहां पर एक मेला आयोजित होता है। चंद्रभागा में नहाने के लिए लाख-लाख लोग यहां आते हैं। समुद्र तट पर सूर्य उदय अत्यंत मनमोहक। एक बार चंद्रभागा में सूर्य उदय देखने से उसके मन में छप जाती है। समुद्र तट पर खड़े होकर सागर की अनंत नीलिमा की उपभोग कर सकते हैं।

निष्कर्ष

कोणार्क मंदिर की देखभाल के लिए सरकार बहुत सर कदम उठाया है। यह दुनिया में फेमस मंदिर सुरक्षा के प्रति नजर देना चाहिए। यहां पर विदेशी पर्यटक को आकर्षण करने की उद्देश में शहर में बड़े-बड़े हटेल निर्माण होना उचित।

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