अतिरिक्त मूल्य क्या है | Karl Marx theory of surplus value in Hindi

Published by Dakshya on

जर्मन के दार्शनिक Karl Marx साम्यवाद के मुख्य प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। आधुनिक युग में मार्क्सवाद एक प्रभावशाली बिप्लबी राजनीतिक दर्शन है। आज हम जानेंगे Karl Marx theory of surplus value in Hindi मे आसान तरीके से।


पूंजीवाद के विरोध में आवाज उठाने के लिए मार्क्सवाद का सृष्टि हुआ है। यह पूंजीवाद समाज से शोषण, अन्याय और अत्याचार को दूर करने के लिए मार्क्सवाद  सृष्टि हुआ है। Karl marx  के Theory of surplus value मार्क्सवाद की अलग एक उपादान है जिसमें पूंजीपति शोषण के ऊपर बताया गया है।

अतिरेक मूल्य सिद्धांत क्या है ?

Scientific Socialism theory के मुख्य प्रवक्ता Karl Marx उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक Das Capital में अतिरिक्त  मूल्य सिद्धांत के बारे में बताए हैं। एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो के द्वारा विशेष रूप से प्रभावित हुए थे। डेविड रिकार्डो के द्वारा दिया गया सिद्धांत  थ्यरी ऑफ लेवल वैल्यू के ऊपर विशेष रूप से प्रभावित हुए थे।


कार्ल मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद- अतिरिक्त मूल सिद्धांत(theory of surplus value) के ऊपर आधारित है। इस अतिरिक्त मूल के कारण अल्पसंख्यक पूंजीपति के पास अधिक संपत्ति जमा होता है। जो लोग अन्य लोगों को शोषण करते है उन लोगों के पास संपत्ति जमा होने के द्वारा वह लोग धनी से आर अधिक धनी होते हैं और दरिद्र लोग आर दरिद्र होते चले जाते हैं । कार्ल मार्क्स से पहले श्रमिकों को अपने श्रम के लिए श्रम लागत (Labour cost) के हिसाब से दिया जाता था। 


इस Labour cost मूल्य से ही अतिरिक्त मूल्य की सृष्टि हुआ है। Marx  के अनुसार श्रम की कोई मोल नहीं है लेकिन जब वह श्रम विनियोग करके एक वस्तु बनाया  जाता है और उसका बाजार में जरूरत(Demand)होता है तभी उसका मूल निर्धारित होता है यानी कि श्रम की मूल्य निर्धारित होता है।


कार्ल मार्क्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु की एक प्राकृतिक मूल्य( वास्तविक मूल्य) और एक नूतन  मूल्य होता है होता है। एक वस्तु की अंतर्निहित value को प्राकृतिक मूल्य कहते हैं । वही वस्तु पर श्रमिक अपना श्रम नियोजित करके एक नया वास्तु बनाता है उस  वस्तु से जो मूल्य निकलता है उसे ही नूतन मूल्य कहते हैं। उदाहरण के तौर पर एक लकड़ी(वस्तु) की मूल्य उसका प्राकृतिक मूल्य होता है लेकिन उस लकड़ी से एक टेबल( नूतन वस्तु) बनाया जाए तब उस टेबल का मूल्य को नूतन मूल्य कहा जाता है।


इस नूतन मूल्य को विनिमय मूल्य(Exchange value)भी कहते हैं  , जिसमें  पूंजी और श्रम लगता है। श्रम ही वस्तु की मूल्य निर्धारित करता है। बिना श्रम विनियोग करके कोई भी वस्तु की नूतन मूल्य नहीं बाहर कर सकते । प्रत्येक वस्तु की मूल्य उससे उत्पादित करने में लगा हुआ श्रम के ऊपर निर्भर करता है। कार्ल मार्क्स के अनुसार कोई भी वस्तु का ऐसे ही उत्पादन हो नहीं सकता, वस्तु के उत्पादन के लिए श्रमिकों की श्रम विनियोग आवश्यक है। इस तरह से श्रमिक अपना श्रम के द्वारा किसी भी वस्तु की मूल्य निर्धारण करता है।


C.E.M. Joad अतिरिक्त मूल्य की Definition देते हुए कहे हैं ” पूंजीपति दरिद्र श्रमिकों के श्रम को खरीद के अपने यंत्र पाती और कच्चा माल के साथ विनियोग करके एक नूतन वस्तु सृष्टि करता है जिसका एक विनिमय मूल्य  होता है। विनिमय मूल्य यानी कि वस्तु की बाजार मूल्य को बुझाता है जिसमें कि श्रमिकों को दिया गया पारिश्रमिक एवं कारखाने की देखरेख, निरीक्षण के लिए किया गया खर्च से अधिक होता है। उत्पादित वस्तु की विनिमय मूल्य एवं श्रमिकों को  पारिश्रमिक के रूप से दिया गया मूल्य के बीच की अंतर को ही अतिरिक्त मूल्य(surplus value)कहते हैं” ।


आसान भाषा में बोले तो प्रत्येक वस्तु का वास्तविक मूल्य उस पर खर्च किए गए श्रम के अनुसार होता है। लेकिन बाजार पर वह काफी ऊंचे दाम पर बेची जाती है . उससे बेचने के बाद जो प्राप्त होता है यानी कि पैसा, उस पैसे में से खर्च को काट दे तो जो बच जाता है (Profit)  उसे ही कहते हैं अतिरिक्त मूल्य। यानी कि किसी भी चीज को बेचने के बाद मिला प्रॉफिट कोई कहते हैं अतिरिक्त मूल्य।

Features:

श्रम वस्तु की मूल्य(value)निर्धारित करता है। किसी भी वस्तु की प्राकृतिक मूल्य एवं विनिमय मूल्य के बीच में अंतर सिर्फ श्रमिकों की श्रम के द्वारा ही संभव हो सकता है।


श्रम वस्तु की मूल्य निर्धारण करता है। इसलिए इसका सारा श्रेय श्रमिकों को जाना चाहिए। वस्तु की अतिरिक्त मूल्य पाने का श्रमिकों को पूरा हक है। लेकिन श्रमिकों को कुछ वेतन तथा पारिश्रमिक दिया जाता है।


वस्तु के साथ श्रम के भी विनियोग करके एक नूतन वस्तु सृष्टि होता है एवं उसका जो बाजार दर यानी कि विनिमय मूल्य तय किया जाता है । इसका परिमाण कितना होता है? – वस्तु की प्राकृतिक मूल्य से भी अधिक होता है । इस अधिक मूल्य बा अतिरिक्त मूल्य बा प्रॉफिट पाना श्रमिकों का हक है । Profit पाना उनका हकदार है। लेकिन पूंजीपति सारा Profit  खुद रख लेता है।


इस तरह से पूंजीपति श्रमिकों को शोषण करते हैं। फल स्वरूप पूंजी पतियों को शोषणकारी और श्रमिकों को सर्वहारा बुलाया गया है। इसके द्वारा पूंजीपति धनी से अधिक से अधिक धनी एवं श्रमिक अधिक दरिद्र होते जा रहे हैं।


श्रमिक इस विषय में अवगत होकर भी अपने परिस्थिति को दृष्टि में रखकर कुछ पारिश्रमिक लेकर अपनी श्रम विनियोग करने के लिए बेबस होता है। कोई भी चीज बनाने के लिए उसके पास ना पैसा होता , ना साधन केवल उसके पास अपना श्रम होता है। इसीलिए वह पूंजीपतियों के आगे अपने श्रम को नियोजित कर देता है।


लेकिन Last मैं श्रमिक अपने शोषण के विषय में अवगत होकर श्रमिक गोष्टी  सचेतन होते हैं।। उनके अंदर असंतोष की ज्वाला जलती है एवं एक अच्छी समाज के लिए एक श्रेणी विहीन समाज प्रतिष्ठा के लिए वह संग्राम करता है।

समालोचना (Criticism)- Karl Marx के अतिरिक्त मूल्य के ऊपर आलोचना।

1.केवल श्रम ही एक वस्तु को सृष्टि करता है इस तरह की धारणा केवल गुमराह करना है। वस्तु को बनाने के लिए फ्रॉम के साथ-साथ अर्थ, तकनीकी ज्ञान, चलाने के लिए उपकरण आदि आवश्यक होता है।


2.बट्रेंड रसैल के अनुसार प्रॉफिट बा रितिक मूल्य सिद्धांत एक निंदनीय काल्पनिक सिद्धांत के अलावा और कुछ नहीं।

इस सिद्धांत दे के Karl Marx एक विद्रोही के हिसाब से  जाने जाते हैं। Economic परिवर्तन लाने के लिए karl marx विद्रोही के रूप में खड़े होकर समाज में गोष्टी संघर्ष के लिए रास्ता प्रस्तुत किए थे।

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