जानिए क्यों अरस्तू (Aristotle) को राजनीति विज्ञान का जनक कहा जाता है? Father of Political Science in hindi

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आज हम जानेंगे क्यों एरिस्टोटल को राजनीतिक विज्ञान का जनक कहा जाता है । प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक एरिस्टोटल (384 ई.पू. – 322 ई.पू.) एक भौतिकवादी दार्शनिक के रूप में परिचित है। एरिस्टोटल के बारे में इसकी योगदान के बारे में विशेष रूप से चर्चा करेंगे । Aristotle Father Of Political Science In Hindi .

एरिस्टोटल के जीवन के बारे में अधिक जानने के लिए आप आगे लिखें वाक्य को क्लिक करके पढ़ सकते हैं- एरिस्टोटल के जीवन परिचय.

अरस्तू (Aristotle) को राजनीति विज्ञान का जनक  क्यों कहा जाता है।

एरिस्टोटल के द्वारा लिखी गई पुस्तक पॉलिटिक्स राजनीति विज्ञान के लिए एक श्रेष्ठ योगदान है। राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से अलग करके एक स्वतंत्र विषय रूप में दुनिया के सामने परिचित कराया । राजनीति को सर्वोच्च सामाजिक विज्ञान के रूप में मान्यता दिलाई थी।

चलिए  डिटेल्स मे जानते हैं राजनीति विज्ञान प्रति उनका क्या क्या योगदान रहा है। किन कारणों से उन्हें राजनीति विज्ञान का पिता का मान्यता मिला है। एरिस्टोटल के योगदान केेे बारे में जानने से पहलेे हमें राजनीतिक विज्ञान किसे कहते हैं उस बारे में थोड़ा जान लेना चाहिए ।

Aristotle

राजनीतिक विज्ञान क्या है ?

सामान्य तौर पर, Knowledge की एक ऐसी शाखा जे राष्ट्र और सरकार की प्रणाली के अध्ययन से संबंधित है, जिसका अर्थ है, राजनीतिक गतिविधि और व्यवहार के वैज्ञानिक विश्लेषण को राजनीति विज्ञान के रूप में माना जाता है ।

वर्तमान में कहते हैं कि राजनीति विज्ञान मनुष्य की उन कार्यकलाप का अध्ययन करने वाला विज्ञान है, जिसका संबंध उसके जीवन के राजनीतिक पहलू से होता है। अर्थात व्यक्ति की राजनीतिक संबंध का अध्ययन किया जाता है।

प्लेटो को क्यों राजनीतिक विज्ञान का जनक कहा नहीं जाता

पाश्चात्य राजनीतिक विचार का शुरुआत सुकरात से हुआ था। सुकरात थे सबसे प्राचीन विचारक और उनके शिष्य थे प्लेटो और प्लाटों के शिष्य थे एरिस्टोटल। प्लेटो ने भी काफी सिद्धांत दिए हैं और संपूर्ण रूप से दिए हैं लेकिन उन्हें फादर ऑफ पोलिटिकल साइंस नहीं कहा जाता, कहां जाता है एरिस्टोटल को उनके शिष्य को । 

सवाल उठता है सुकरात भी तो पहले आए थे उन्हें क्यों नहीं कहा जाता राजनीतिक विज्ञान का पिता। इसका सिंपल सा जवाब है- सुकरात का विचार में नैतिकता और सद्गुण की बात होती थी। लेकिन प्लेटो ने भी अपने विचार में न्याय, आदर्श राष्ट्र, शिक्षा आदि सिद्धांत दिए हैं उन्हें क्यों नहीं कहा जाता राजनीतिक विज्ञान का जनक इसका भी सिंपल सा जवाब है- 

प्लेटो अपना पूरा जीवन एक आदर्श राष्ट्र की खोज करते रहे वह अपना सारा जीवन एक आदर्श राजा, आदत राष्ट्र, की खोज में बिता दिए। जब वह Sicily  गए और वहां से निराश होकर वापस आए और विचार दिए थे ” मैं जो आदर्श राजा और आदर्श राष्ट्र की खोज कर रहा था लगता है वह इस दुनिया में संभव नहीं है, आदर्श राष्ट्र एवं आदर्श राजा केवल कल्पना में ही संभव हो सकता है इस दुनिया में नहीं” । प्लेटो अपने विचार को कल्पना प्रस्तुति बनाए हैं लेकिन एरिस्टोटल की बात करें तो उनकी विचार हमेशा वास्तविक रहा है। इसलिए एरिस्टोटल को भौतिक वादी दार्शनिक कहते हैं।

प्लेटो के बारे में अधिक जानने के लिए यहां क्लिक कीजिए :- प्लेटो के जीवनी और आदर्श राष्ट्र

Books:

•  No. 1: Politics. … 

• No. 2: Metaphysics. … 

• No. 3: Nicomachean Ethics 

• No. 4: On the Soul (De Anima)

• No. 5:  Historia animalium

एरिस्टोटल के योगदान: 

एरिस्टोटल की राजनीतिक विज्ञान के लिए क्या क्या कंट्रीब्यूशन रहा है ।  निम्नलिखित योगदान के कारण उन्हें कहा जाता है Father of political science in hindi . इसकेेे अलावा Aristotle जंतु इतिहास नाम से एक पुस्तक लिखे  जिसमें वह 500 जंतुओं की रचना, स्वभाव, वर्गीकरण, जनन आदि के बारे में उल्लेख किए हैं। इसीलिए उन्हें जंतु विज्ञान का जनक (Father of Biology) कहते हैं।

1. पॉलिटिक्स:

एरिस्टोटल के पुस्तक “Politics” राजनीति विज्ञान के लिए एक श्रेष्ठ अवदान है। राष्ट्र और सरकार के बारे में इस पुस्तक में विशद रूप में आलोचना करी गई है। उनके अनुसार राष्ट्र एक  मानव  संगठन है अर्थात राष्ट्र एक मानव निर्मित संस्था (Human organisation) है। उनके बाद के दार्शनिक उनसे विशेष रूप से प्रभावित हुए ।

2. उपयोगितावाद: 

एरिस्टोटल के अनुसार राष्ट्र व्यक्ति के लिए उपयोगी है। राष्ट्र एक नकारात्मक नहीं है बल्कि सकारात्मक अनुष्ठान है, जिसका प्रथम उद्देश्य है यहां का जनसाधारण की मंगल साधन करना। व्यक्ति के लिए राष्ट्र सृष्टि हुआ है।  एरिस्टोटल के अनुसार ” मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण के लिए राष्ट्र सृष्टि हुआ है एवं सर्वोत्तम आवश्यकता के लिए इसका स्थिति अब तक है।” 

3. अधिकारों का विभाजन: 

Montesqui से पहले एरिस्टोटल ने अधिकारों विभाजन नीति की बारे में वर्णन की थी। इसीलिए एरिस्टोटल को Montesqui  से पहले सिपरेशन ऑफ पावर का प्रवक्ता कहा जाता है। उनके अनुसार सरकार 3 भाग में विभाजित है यानी कि सरकार को तीन भागों में बाटा गया है व्यवस्थापिका (Legislative), कार्यपालिका (Executive), न्यायपालिका (Judiciary) यह सब खुद से अलग अलग है। एरिस्टोटल के अनुसार अधिकारों का विभाजन होना बहुत  आवश्यक है।

4. स्वतंत्रता और अधिकार के बीच संपर्क:

Aristotle स्वतंत्रता और प्रभुत्व के बीच संतुलन बनाए रखा ।उनके अनुसार संवैधानिक  आईन पालन करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकार सुरक्षित हो पाते हैं। संविधान और आईन प्रति निष्ठा रखने से व्यक्ति की स्वतंत्रता दिखाई देती  है। हर व्यक्ति कानून के हिसाब से काम करें तो अपने साथ-साथ दूसरों के भी स्वतंत्रत  रख पाएगा।

5. कानूनी शासन: 

एरिस्टोटल कानूनी शासन के ऊपर बहुत महत्व देते थे। उनके अनुसार राष्ट्र में व्यक्ति की नहीं बल्कि कानूनी शासन व्यवस्था प्रचलित होना चाहिए। उनके समय में एथेंस में कानून के बिना शासन चलता था जिससे भ्रष्टाचार और अराजकता राष्ट्र में दिखाई दे रहा था, इसलिए वह राष्ट्र में कानूनी शासन के बारे में जोर देते थे । उनके आदर्श राष्ट्र में Law  सर्वोच्च स्थान में स्थापित है।

 उनके अनुसार मनुष्य सारे जीवो के बीच में श्रेष्ठ है लेकिन कानून तथा न्याय को उसके जीवन से अलग कर दिया जाए तो वह पशु के समान हो जाएगा। यानी कि कानून बिना मनुष्य की जीवन जानवर जैसा होगा । इसलिए आदर्श राष्ट्र के लिए तथा आदर्श नागरिक के लिए कानून नितांत आवश्यक है।

6. नीति शास्त्र और राजनीति: 

एरिस्टोटल ने नीति शास्त्र से राजनीति को अलग किए थे। प्लेटो के विचार धारा कल्पना आधारित है जबकि एरिस्टोटल एक भौतिकवादी दार्शनिक के रूप में सुधार पर गुरुत्व देते थे। इसलिए उन्हें राजनीतिक विज्ञान का जनक कहा गया है।

7. राजनीति और अर्थशास्त्र : 

एरिस्टोटल राजनीति और अर्थशास्त्र के बीच में एक संपर्क स्थापन किए थे। उनके अनुसार राजनीति और अर्थशास्त्र एक दूसरे के बीच में निर्भर रहते हैं। राष्ट्र शासन चलाने के लिए अर्थनीति की महत्व होता है। दूसरे पक्ष से राजनीतिक विज्ञान द्वारा अर्थनीति व्यवस्था सुशासन हो पाता है। अर्थशास्त्र राजनीतिक संगठन के ऊपर प्रभावित करता है और राजनीतिक कार्य देश की अर्थनीति व्यवस्था के ऊपर भी निर्भर करता है।

8. संविधान की सर्वोच्चता: 

संविधानिक शासन व्यवस्था के ऊपर एरिस्टोटल गुरुत्व देते थे। उनके अनुसार संविधान राष्ट्र की सर्वोत्तम आईन(the supreme law at the land)। इसको कोई विरोध कर नहीं सकता। संविधान की आधारभूत संरचना(basic infrastructure) एरिस्टोटल के समय से ही शुरू हुआ था।

9. तुलनात्मक पद्धति:

एक दार्शनिक के हिसाब से एरिस्टोटल  राजनीतिक विज्ञान को अध्ययन करने के लिए तुलनात्मक पद्धति अनुसरण किए थे। उनके बुक  पॉलिटिक्स में वह राष्ट्र और सरकार के संबंधित सिद्धांत के बारे में बताए थे। यह सिद्धांत देने के समय वह दुनिया की 150 राष्ट्रों की संविधान को तुलनात्मक रूप से अध्ययन किए थे।

10. मध्यमवर्ग श्रेणी के ऊपर गुरुत्व:

एरिस्टोटल के अनुसार राष्ट्र  शासन में मध्यम वर्ग के श्रेणी की भूमिका अहम होती है। राष्ट्र की स्थिरता और प्रगति के लिए मध्यमवर्ग श्रेणी के हाथ में शासन की डोर रहना आवश्यक है। अमीर वर्ग श्रेणी के हाथ में पावर होने से सत्ता के अंदर अराजकता बढ़ेगा। अराजकता का अर्थ है राष्ट्र में राजा या शासक का ना होना और कानून विरोध शासन चलाना। इसीलिए एरिस्टोटल मिडिल क्लास के ऊपर इंपॉर्टेंस देते थे।

11. Conservatism:

एरिस्टोटल की चिंता धारा में रूढ़िवाद दिखाई देता है। रूढ़िवाद क्या होता है इसका मतलब है यह एक ऐसा व्यक्ति का आभास देता है जिसके अंदर नरम अथवा चौकस होता है । एक रूढ़िवादी दार्शनिक के हिसाब से प्राचीन परंपरा और  अनुष्ठान के प्रति वह सम्मान प्रदर्शन करते थे और उसकी सुरक्षा के लिए इच्छा जताए थे।

12. निजी संपत्ति की सुरक्षा:

प्लेटो संपत्ति साम्यवाद के ऊपर गुरुत्व देते थे लेकिन उनके शिष्य एरिस्टोटल इसके विरोध में है । उनके अनुसार व्यक्तिगत संपत्ति मनुष्य के विकास के लिए जरूरी है। यहां मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार होता है । व्यक्तिगत संपत्ति के द्वारा व्यक्ति और समाज की विकास होता है। इसीलिए निजी संपत्ति के ऊपर जोर दिए थे ।

13. व्यक्तिवाद का प्रवक्ता:

एरिस्टोटल एक व्यक्ति बाद के रूप में भी जाने जाते हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास के लिए उसका स्वतंत्रता अखंड रहना चाहिए। व्यक्ति स्वतंत्र रहेगा तभी वह अपने साथ-साथ राष्ट्र के भी विकास कर पाएगा।

राजनीतिक विज्ञान के लिए एरिस्टोटल यथेष्ट योगदान दिए हे। राजनीतिक विज्ञान को नीति शास्त्र से अलग करके इसको एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान के रूप में मान्यता दिए हैं। राष्ट्र की सुशासन, संवैधानिक व्यवस्था, नागरिकता, क्षमता की श्रेणी करण आदि विषय में उनकी चिंता भरा अतुलनीय है। उनकी परवर्ती समय की दार्शनिकों को विशेष रूप से प्रभावित किए हैं। उनकी इस सब अवदान के लिए उनकी गुरु प्लेटो को राजनीतिक विज्ञान का जनक का मान्यता नहीं देकर उनको Father of political science  बोलकर मान्यता दिया गया है।

अंतिम शब्द

यह थी दोस्तों एक महान दार्शनिक, वैज्ञानिक के बारे में कुछ जानकारी. आशा करता हूं आपको यह आर्टिकल से मिली जानकारी पसंद आया होगा। ऐसे ही राजनीति विज्ञान के बारे में और भी जानकारियां जानना चाहते हैं तो हमारे अन्य पोस्ट को भी जरूर पड़ेगा. और अपने अन्य दोस्तों को भी जरूर शेयर कीजिए जिससे अन्य लोगों को ही यह जानकारियां उपलब्ध हो और कमेंट करके जरूर बताइए जिससे हम आपके विचारों को समझ सके और हमारे सेव कोई त्रुटि को सुधार सकें.


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